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उर्दू दिवस के मौके पर प्रोफेसर अब्दुल अजीज की जुबानी जानिए दिल्ली में उर्दू का इतिहास…

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बीते रोज दिल्ली में उर्दू दिवस बड़े धूम-धाम से मनाया गया. दिल्ली में 18 वीं शताब्दी के आखिर तक सभी सरकारी दस्तावेज फारसी में थे. लेकिन मुगल साम्राज्य के पतन के साथ उर्दू अधिक आम हो गयी. दिल्ली के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज के पूर्व उर्दू प्रोफेसर अब्दुल अजीज बताते हैं कि अंग्रेजों ने 1830 के दशक में उर्दू भाषा को आधिकारिक भाषा बनाया और 1 947 तक उर्दू स्कूलों में शिक्षा का माध्यम था.

उर्दू आजादी की लड़ाई की प्रतिनिधि बन गयी थी…
इतिहासकार और लेखक राणा सफ़ी जिन्होंने ज़हीर देहलवी के दस्तान-ए-गदर का अनुवाद किया का कहना है कि उर्दू आजादी की लड़ाई की प्रतिनिधि बन गयी थी. उर्दू बहुत क़रीब से भारत के स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ जुड़ी हुई थी. उसी वक़्त एक जागरूकता फैली कि उर्दू को गम-ए-जान से परे जाना चाहिए और समाज के सुधार के लिए एक एकीकृत उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाए.

यह काफ़ी दिलचस्प है कि दिल्ली को उर्दू-या-मौला कहा जाता था और भाषा को ज़बान-ए-उर्दू- मौला की भाषा के रूप में जाना जाता था. विस्थापन और विभाजन के दौरान भूमि और परिसंपत्तियों के बड़े पैमाने पर नुक़सान के साथ भाषा को भी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

भाषा के बीच लड़ाई 1830 के आसपास शुरू हुई….
अजीज बताते हैं कि भाषा के बीच लड़ाई 1830 के आसपास शुरू हुई. फिर 1920 के दशक में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विभाजनकारी सेना आ गई. ताबूत में अंतिम कील तब लगी थी जब पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया था. इसने भारत में लोगों को उर्दू के साथ पूरी तरह से दूर करने के लिए प्रेरित किया यह सांप्रदायिक राजनीति का शिकार बन गया.

1947 के बाद हालात बदल गए….
शहर में यहां तक ​​कि कॉलेजों में इंडो-आर्यन भाषाओं के लिए प्रमुख केंद्र थे. लेकिन यह 1947 के बाद बदल गया. विभाजन से पहले सेंट स्टीफन, हिंदू और श्रीराम कॉमर्स ऑफ कॉमर्स, उर्दू, अरबी, फारसी और संस्कृत का सबसे बड़ा केंद्र थे. सफ़ी बताते है कि भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने की खोज हमें पुरानी दिल्ली, उर्दू बाज़ार के अंदर ही ले आती है. पहले यहाँ पर प्रकाशकों का बड़ा केंद्र हुआ करता था लेकिन अब कुछ हाई बचे हैं.

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