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इफ्तार पार्टी कल्चर, क्या मुसलमान दीन से भटकने वाले रास्ते पर चल पड़ा है? शेयर जरूर करें

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इफ्तार पार्टी. यह कल्चर दिन ब दिन आम होता जा रहा है. मैं भी कभी इसी कल्चर का हिस्सा था. पूरे शहर में होने वाली इफ्तार की दावतों में ख़ुशी से शिरकत करता था. वो पार्टियां मुख्तलिफ गिरहों की हुआ करती थी. कभी किसी पोलिस स्टेशन की पार्टी होती, तो कभी किसी बिजनेस ग्रुप की पार्टी होती.

कभी किसी गैर मुस्लिम दोस्त की तरफ से दावत होती तो कभी कोई सियासी इफ्तार पार्टी होती. मैं ऐसी दावतों में लगातार ८-१० सालों से शिरकत कर रहा हु. जब यह कल्चर नया नया पैदा हुआ था, बिलकुल तब से. अब तो यह कल्चर गोया रमज़ान की पहचान बन चूका है.

लेकिन इस साल मैं किसी इफ्तार पार्टी में नहीं जाऊंगा. जितना इस्लाम पर गौर करता जा रहा हु, इस्लाम की हकीकत खुल के सामने आती जा रही है. हम सब जानते है के रोज़ा एक इबादत है. यह सिर्फ भूके रहने की इबादत नहीं है, अपने आपको अपने रब से करीब करने की इबादत है.

उस रूहानी हैसियत को हासिल करने का ज़रिया है जिसे ‘अहसान’ से ताबीर किया गया है. यह इमान की ऐसी हालत है जिसमे गोया आप अपनी खुली आँखों से अपने रब को देख रहे हो. यह बहोत बड़ा दर्जा है, बहोत बड़ा मक़ाम है. यह आसानी से हासिल नहीं होता. उसके लिए दरकार है ‘तक़वे’ का होना. और तक़वे को अमली ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने की मश्क़ रोज़ा है.

इफ़्तार उस रोज़े की इन्तेहा है. रोज़ेदार दिनभर की भूक और प्यास से बेहाल, उस वक़्त का इंतज़ार कर रहा होता है की वो अपने रब की इजाज़त से रोज़ा इफ्तार कर ले. सारे दिन की भूख और प्यास निढाल कर देती है. जब वो ऐसी हालत में, गीली आँखों से, मुरझाये हुवे चहरे से अपने आप को अपने रब के आगे बिछा देगा.

सोचो तो वो कैफियत क्या होगी? असमान की तरफ हाथ उठाये वो दुआ करेगा, मेरे रब कबूल कर, मेरे इस रोज़े को कबूल कर. मेरी आज की मशक्क़त, यह तकलीफ युही जाया न कर. इसे कबूल कर. मैंने तेरे लिए ही तो रोज़ा रखा था. तेरी रज़ा के लिए ही तो अपने आपको मशक्क़त में डाले रख्खा था.

रोज़े में इस कैफियत का हसिल होना ज़रूरी है. मैं इफ्तार की दावतों को पिछले १० सालों से करीब से देखता आ रहा हु. वहां इस कैफियत का पैदा होना नामुमकिन है. यह कैफियत मजलिसों में पैदा नहीं हो सकती. ख़ास तौर पर उन मजलिसों में जहा ‘मतलब’ हो हासिल करने की चहल पहल हो रही हो.

जहा किस्म किस्म की ने’अमते आपके आगे बिछा दी गई हो. गोया जैसे जश्न का माहोल हो. गोया जैसे कोई ‘सेलिब्रेशन’ का मौका हो. इफ्तार ना तो जश्न है, ना कोई ‘सेलिब्रेशन’. इफ्तार आपका अपने रब से जुड़ने का बहतरीन मौका है जो इस तरह की पार्टियों में ज़ाया हो जाता है.

इफ्तार खाने पिने का मौक़ा नहीं है की आप सारे शहर से ढूंड ढूंड कर खाने की चीज़े लेकर आये. इफ्तार तो बस नफ्स को उन जाएज़ कामो को करने की इजाज़त देने का मौक़ा है, जिनसे आपको रोज़े के हालत में रोका गया था. तो भाईयो रुक जाईये,

हर साल बर्बाद होने वाले रमज़ान को इस बार बर्बाद होने मत दीजिये. दूर रहिये ऐसी इफ्तार की दावतों से, जहाँ यह भी पता नहीं होता की माल हलाल का आया है या हराम का? क्या पता किस दावत में हराम के माल से खाने की चीज़े खरीदी गई हो.

यह बात अलग है कि आपका कोई गैर मुस्लिम भाई आपको इफ्तार की दावत पर बुलाये. ऐसे मौक़े पर उसका दिल मत तोडिये. जाईए. हो सके तो उसके लिए कोई तोहफा लेकर जाईए. लेकिन याद रहे उसे आते वक़्त समझा कर आईये के भाई मैं अगली बार नहीं आ सकता. इस बार बस आपका दिल रखने के लिए आया हूँ और उसे इफ्तार की असल हकीकत बताईये.

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