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स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि “अंग्रेजों” के एजेंट थे सावरकरः मार्कंडेय काटजू ने उड़ा दीं संघ की धज्जियाँ

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“एक ओर जहां केंद्र सरकार आज देश में विनायक दामोदर सावरकर जयंती मनाती है वहीं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने सावरकर के स्वतंत्रता सेनानी होने पर ही सवाल उठा दिए हैं और कहा है कि वह अंग्रेजों के एजेंट थे!”

काटजू ने प्रख्यात कानूनविद् फली एस. नरीमन को भेजे एक ईमेल में विकीपीडिया पर सावरकर के बारे में दी गई जानकारियों में से चुनिंदा अंश का जिक्र करते हुए कहा है कि वर्ष 1910 के बाद से सावरकर स्वतंत्रता सेनानी नहीं रहे !

काटजू ने इस मेल में लिखा है कि आज ‘वीर सावरकर’ की जयंती है और कई लोग उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद करते हैं मगर उनके बारे में सच्चाई पर ध्यान दिया जाना चाहिए। काटजू के अनुसार सच यह है कि ब्रिटिश राज में जो राष्ट्रवादी लोग गिरफ्तार किए जाते थे उन्हें सरकार अपने साथ सहयोग करने का प्रस्ताव देती थी और सहयोग की शर्त पर उन्हें छोड़ दिया जाता था। काटजू के अनुसार अधिकांश लोग सरकार के सहयोगी बन जाते थे जिसमें सावरकर भी शामिल थे। काटजू के अनुसार सावरकर सिर्फ 1910 तक राष्ट्रवादी थे जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था और दो उम्र कैद (50 वर्ष) की सजा सुनाई गई थी। दस साल जेल में बिताने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें भी यह प्रस्ताव दिया जिसे सावरकर ने मंजूर कर लिया। काटजू के अनुसार जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने हिंदू समुदाय के लिए प्रचार आरंभ कर दिया और एक ब्रिटिश एजेंट बन गए और अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति में मदद करने लगे। काटजू के अनुसार सावरकर ने हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह नारा दिया कि सभी नीतियों को हिंदूत्व के अनुसार बनाओ और हिंदुओं को लड़ाकू बनाओ। उन्होंने भारत में दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया और बदले में हिंदुओं को सैन्य प्रशिक्षण की उम्मीद रखी। जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का नारा दिया तो सावरकर ने इसकी आलोचना की और हिंदुओं से अपील की कि वह युद्ध में भाग लें और सरकार की मुखालफत न करें। उन्होंने हिंदुओं से कहा कि युद्ध में हिस्सा लेकर लड़ाई की कला सीखें। हालांकि यह अपील सिर्फ हिंदुओं के लिए थी।

अंत में काटजू ने अपने मेल में सवाल उठाया है कि क्या ऐसे शख्स तो स्वतंत्रता सेनानी कहा जाना चाहिए और उसके नाम के साथ वीर लगाया जाना चाहिए? काटजू के अनुसार असली वीर तो भगत सिंह, सूर्य सेन, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, खुदीराम बोस आदि थे जिनमें से अधिकांश को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। सावरकर में वीर जैसी क्या बात थी ?

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