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हिन्दू महिलाओं को सबसे पहले मुस्लिम शासक ने दिया था जीने का अधिकार; पढ़कर शेयर ज़रूर करें

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यह बात बिलकुल सच है कि हिंदुस्तान में सबसे पहले ”सती प्रथा” पर मुस्लिम शासक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने रोक लगाई थी. 1027 ईस्वी में शाहबद्दीन मुहम्मद गौरी को जब भारत में प्रथा के बारे में जानकारी मिली तो उसने इस कुप्रथा को फ़ौरन रोकने का हुकुम जारी किया था. उन्होंने आदेश दिया था कि अगर किसी महिला को उसके पति के मरने के बाद उसके साथ जलाया गया तो ऐसा करने वालो को सख्त सजा दी जाएगी. गौरी के इस आदेश कि जानकारी आज भी भारतीय पुरातत्व विभाग और इंडियन आर्कईव पर मोजूद है.


राजा राममोहन राय ने भी सती के खिलाफ आंदोलन चलाया…
राजा राममोहन राय ने भी सती के खिलाफ आंदोलन चलाया था. यह आन्दोलन समाचार पत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चलाया गया था. इसका विरोध इतना अधिक था कि एक मौके पर तो उनकी जिंदगी ही खतरे में पड़ गई थी. 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके. जब कट्टर लोगों ने इंग्लैंड में ‘प्रिवी कॉउन्सिल’ में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया, तब उन्होंने भी अपने प्रगतिशील मित्रों और साथी कार्यकर्ताओं की ओर से ब्रिटिश संसद के सम्मुख अपना विरोधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया था. उन्हें खुशी हुई जब प्रिवी कॉउन्सिल ने सती प्रथा के समर्थकों के प्रार्थना पत्र को अस्वीकृत कर दिया था.
 सती प्रथा का अर्थ…
सती संस्कृत शब्द ‘सत्’ से निकला है. भारतीय हिन्दु समाज मे प्रचलित एक ऐसी धार्मिक प्रथा है जिसमे पुरुष की मृत्योपरांत उसकी विधवा हुई पत्नी उसके अंतिम संस्कार के दौरान उसकी जलती हुई चिता में प्रविष्ठ हो कर आत्मदाह कर लेती थी. इस प्रथा को इसका यह नाम देवी सती के नाम से मिला है जिन्हें दक्षायनी के नाम से भी जाना जाता है.

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