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कुएं की खुदाई से टीपू सुल्तान के ऐसे हथियार आए सामने, वैज्ञानिक भी हो गए सन्न, कहा- इसके आगे…

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टीपू सुल्तान ने अपनी सेना में आगे बढ़ने वाली ब्रिटिश सेना से लड़ने के लिए तलवार और ब्लेड फेंक रॉकेट का उपयोग करने की अवधारणा दुनिया के सामने रखी थी. मैसूर सेना में एक नियमित रॉकेट कोर थी, जो हैदर अली के वक़्त में लगभग 1,200 लोगों के साथ शुरू हुई थी.

ब्रिटिश हार में योगदान देता है…
पोलिलुर (1780) की लड़ाई में, दूसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान, कर्नल विलियम बैली के गोला-बारूद के भंडार को हैदर अली के रॉकेट में से एक से एक हिट द्वारा विस्फोट हुआ माना जाता है, जो एक अपमानजनक ब्रिटिश हार में योगदान देता है.

100 से ज्यादा रॉकेट के अवशेष मिले…
बता दें कि कर्नाटक के शिमोगा जिले में एक कुएं की सफाई के दौरान 18वीं शताब्दी के 100 से ज्यादा रॉकेट के अवशेष मिले हैं. यह रॉकेट शेर ए मैसूर टीपू सुल्तान के शासन से जुड़े हुए बताये जा रहे है.

मिसाइल तलवार से लगाए गए थे…
हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान ने एंग्लो-मैसूर युद्धों के दौरान बड़े ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बलों के खिलाफ प्रभावी ढंग से तैनात किया. यह ‘मिसाइल’ तलवार से लगाए गए थे.

और दुश्मनों के सामने किनारों के नीचे आने से पहले हवा के माध्यम से कई मीटर की दूरी पर यात्रा की थी. ब्रिटिश तकनीक में सक्रिय रुचि ले लिया और इसे 1 9वीं शताब्दी के दौरान विकसित किया.

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