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क्या आप जानते हैं वो कौन सी ऐसी दुआ है जिसको अल्लाह के रसूल ने बार-बार दुआओं में शामिल करने को कहा है?

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हज़रत राबिया बिन आमिर (रज़ि०) से रिवायत है कि मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म को यह इर्शाद फरमाते हुए सुना: दुआ में ‘ या “ज़लजलालि वल इकराम ‘ के ज़रिए इसरार करो, यानि इस लफ्ज़ को दुआ में बार–बार कहो. (मुन्तख़ब अहादीस सफा 383)

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हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० फरमाते हैं कि मस्जिदे नब्वी के इर्द – गिर्द कुछ ज़मीन खाली पड़ी थी. बनू सलिमा (जो मदीना मुनव्वरा में एक कबीला था उनके मकान मस्जिद से दूर थे, उन्होंने इरादा किया कि मस्जिद के करीब ही कहीं मुंतक़िल हो जाएं.

यह बात नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म तक पहुंची तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म ने उनसे इर्शाद फ़रमाया: मुझे यह खबर मिली है कि तुम लोग मस्जिद के करीब मुंतक़िल होना चाहते हो. उनहोंने अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह ! बेशक हम यहीं चाह रहे हैं.

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म ने इर्शाद फ़रमाया: बनू सलिमा वहीँ रहो, तुम्हारे (मस्जिद तक आने के) सब कदम लिखे जाते हैं, वहीँ रहो. (मुन्तख़ब अहादीस सफा 164 ,165)

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रसूलुल्लाह सल्लसल्लाहु अलैहि वसल्ल्म ने फ़रमाया: जो शख्स क़ुरआन पढ़े , सीखे और उस पर अमल करे, तो उस को क़यामत के दिन नूर से बना हुआ ताज पहनाया जाएगा, जिस की रौशनी सूरज की तरह होगी,

उस के वालिदैन को ऐसे दो जोड़े पहनाए जाएंगे, के तमाम दुनिया उस का मुक़ाबला नहीं कर सकती वह अर्ज़ करेंगे: यह जोड़े हमें किस वजह से पहनाए गए? इर्शाद होगा: तुम्हारे बच्चे के क़ुरआने मजीद पढ़ने के बदले में. [ मुसतदरक: 2086, अन बुरैदह बिन असलमी रज़ि०]

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