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नौशेरा का शेर, भारतीय सेना का एक ऐसा ब्रिगेडियर जिससे कांपता था पाकिस्तान…..

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उत्तर प्रदेश के अंसारी घराने से संबंध रखने वाले ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान आजादी के बाद देश के लिये शहीद होने वाले सबसे पहले ब्रिगेडियर थे. कश्मीर के नौशेरा में पाकिस्तान से लड़ते हुए वे वीरगती को प्राप्त हो गए थे. ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान नाम की शख्सियत किसी परिचय का मोहताज नहीं है.

नौशेरा घाटी में हुई भारत और पाकिस्तान की लड़ाई में शहीद हुए ब्रिगेडियर उस्मान 1948 की उस जंग में शहीद सबसे बड़े भारतीय सैनिक अफसर थे. नौशेरा के शेर के नाम से मशहूर ब्रिगेडियर उस्मान की शहादत को 70 वर्ष पूरे हो गए हैं.

मौहम्मद उस्मान ने हिन्दुस्तान को चुना…
ब्रिगेडियर उस्मान तीन जुलाई 1948 को पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए शहीद हो गया था. ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई, 1912 को तत्कालीन आज़मगढ़ जनपद (अब मऊ) के बीबीपुर नामक गांव में हुआ था. आज़ादी के बाद सेना के अफ़सरों को यह चुनने की आज़ादी दी गई कि वो हिन्दुस्तान में रहें या पाकिस्तान चले जाएं.

लेकिन ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान ने हिन्दुस्तान को चुना. उन्होंने 1935 में भारतीय सेना की 10वीं बलूच रेजिमेंट से अपने सैन्य करियर की शुरुआत की.

ठुकरा दिया था पाक आर्मी चीफ बनने का ऑफर…
हिन्दुस्तान आजाद हो चुका था और पाकिस्तान भी अपने वजूद में आ चुका था, पाकिस्तान के नेताओं मौहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ने ब्रिगेडियर उस्मान को उनके मुसलमान होने की दुहाई देते हुए पाकिस्तान की सेना में शामिल होने के लिए कहा था.

उस्मान को लालच दिया गया था कि अगर वो पाकिस्तानी आर्मी में शामिल होते हैं तो उन्हें जनरल बना दिया जाएगा, लेकिन मौहम्मद उस्मान ने पाकिस्तान का यह ऑफर ठुकरा दिया. उन्होंने भारतीय सेना में ब्रिगेडियर रहना ही पसंद किया लेकिन पाकिस्तान का आर्मी चीफ बनने का ऑफर ठुकरा दिया. इसकी वजह से उनका तबादलता बलूच रेजिमेंट से डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया.

जब ब्रिगेडियर उस्मान बने ‘नौशेरां के शेर’…
पाकिस्तानी घुसपैठियों ने 25 दिसंबर 1947 तक झांगर नाम के इलाके को अपने कब्जे में ले लिया था. लेकिन यह ब्रिगेडियर उस्मान की बहादुरी थी कि मार्च 1948 में नौशेरां और झांगर दोबारा भारत के कब्जे में आ गए. ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरां में ऐसी बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी कि पाकिस्तान के 1000 सैनिक घायल हुए थे और लगभग इतने ही सैनिक मारे गए थे.

जबकि भारत की तरफ से मात्र 33 सैनिक शहीद और 102 सैनिक घायल हुए थे। अपने नेतृत्व क्षमता की वजह से ही ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को ‘नौशेरां का शेर’ कहा जाता है.

जब पाकिस्तान ने रखा था 50,000 रुपये का इनाम…
नौशेरां की घटना के बाद पाकिस्तानी सरकार ने भारतीय सेना के इस बहादुर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के सिर पर 50,000 रुपये का इनाम रखा था, जो कि उस वक्त के लिहाज से एक बहुत बड़ी रकम थी. ब्रिगेडियर उस्मान ने कसम खाई थी कि जबतक झांगर भारत के कब्जे में नहीं आएगा, तब तक वे जमीन पर चटाई बिछाकर ही सोएंगे.

आखिरकार उन्होंने झांगर पर भी कब्जा जमा लिया, लेकिन 3 जुलाई को झांगर में मोर्चे पर ही पाकिस्तान की तरफ से तोप का एक गोला आ गिरा, जिसकी चपेट में यह बहादुर ब्रिगेडियर मौहम्मद उस्मान आ गए. इस तरह नौशेरा के शेर ने दुनिया से विदाई ली.

फिर नौशेरा के शेर उस्मान को दिया गया महावीर चक्र…
भारतीय सेना के इस बहादुर ब्रिगेडियर उस्मान के अंतिम संस्कार में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी कैबिनेट शामिल हुई थी. आज तक यह सम्मान किसी भी भारतीय सैनिक को नहीं मिला है. ब्रिगेडियर उस्मान आज भी जंग के दौरान शहीद हुए सबसे ऊंचे सैनिक अफसर हैं. उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया था.

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