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जब बहादुरशाह ज़फ़र के सामने थाल में जवान बेटों के कटे सिर लाए गए तो उन्होंने कहा- वल्लाह…..

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बहादुर शाह ज़फर भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू के जाने माने शायर थे. उन्होंने १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया. युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई. उनके बारे में एक किस्सा है कि मुक़दमे के दौरान बहादुरशाह ज़फ़र के सामने थाल लाया गया.

हडसन ने तश्त पर से ग़िलाफ़ हटाया. कोई और होता तो शायद ग़श खा जाता या नज़र फेर लेता. लेकिन बहादुर शाह ज़फर ने ऐसा कुछ नहीं किया. थाल मे रखे जवान बेटों के कटे सिरों को इत्मीनान से देखा. हडसन से मुख़ातिब हुए और कहा कि वल्लाह. नस्ले ‘तैमूर’ के चश्मो चराग़ मैदाने जंग से इसी तरह सुर्ख़रू होकर अपने बाप के सामने आते हैं.

हडसन तुम हार गए और हिंदुस्तान जीत गया. ये बात क़ाबिल ए ज़िक्र है के बहादुर शाह ज़फ़र अपने सलतनत के आख़री दिन तक ख़ुद को नस्ल ए तैमूर यानी तैमूर वंश का मान रहे थे. ज्ञात रहे के लाला क़िला छोड़ कर बहादुर शाह ज़फ़र सीधे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पहुंचे थे.

वहां उनकी मुलाक़ात ख़्वाजा शाह ग़ुलाम हसन से हुई थी; जिन्हे बहादुर शाह ज़फ़र ने बताया, “मुझे कुछ समय पहले ही लग गया था कि मैं गौरवशाली तैमूर वंश का आख़री बादशाह हूं. अब कोई और हाकिम होगा. उसका क़ानून चलेगा. मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है, आख़िर हमने भी किसी और को हटाकर गद्दी पायी थी.

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